नई दिल्ली, एजेंसी। उत्तर प्रदेश में UP Control of Goondas Act, 1970 के इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने गोंडा निवासी जाहिद अली के खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत की गई कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा कि इतने शक्तिशाली कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को परेशान या प्रताड़ित करने के लिए नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि राज्य सरकार गुंडा एक्ट के इस्तेमाल को लेकर अपने पुराने रवैये पर कायम है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कानून का इस्तेमाल केवल उन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए, जहां किसी व्यक्ति की गतिविधियों से वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को खतरा हो।
2010 के मुकदमे में 2017 में हो चुका था बरी
गोंडा जिला प्रशासन ने 11 मई 2026 को जाहिद अली के खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए उन्हें गुंडा घोषित किया था। साथ ही, उन्हें छह महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर रहने का आदेश दिया गया था।
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने सामने आया कि जाहिद अली के खिलाफ कार्रवाई का आधार बनाए गए 2010 के मुकदमे में वह 2017 में ही बरी हो चुके थे। इसके बावजूद पुलिस रिपोर्ट में इस पुराने मुकदमे को इस तरह पेश किया गया, जिससे उनकी स्थिति की गलत तस्वीर सामने आती थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मुकदमे में उसकी संलिप्तता को, उसके बरी हो जाने के बाद, उसे आदतन अपराधी घोषित करने के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
लंबित मुकदमा आदतन अपराधी होने का सबूत नहीं
अदालत ने 2020 के एक मुकदमे को भी गुंडा एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ एक मुकदमा लंबित होना यह साबित नहीं करता कि वह आदतन अपराधी है।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि 2020 के मुकदमे और 2026 में गुंडा एक्ट के तहत की गई कार्रवाई के बीच करीब छह साल का अंतर था। अदालत के अनुसार, इतने लंबे अंतराल के बाद कार्रवाई करने के लिए आवश्यक ‘रीजनबल नेक्सस’ (उचित संबंध) दिखाई नहीं देता।
बीट रिपोर्ट को भी नहीं माना पर्याप्त आधार
पुलिस ने एक बीट सूचना रिपोर्ट को भी जाहिद अली के खिलाफ कार्रवाई का आधार बनाया था। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि उस सूचना के आधार पर कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया गया था। इसके अलावा, जाहिद को इस आरोप पर अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना ऐसी पुलिस रिपोर्ट को गुंडा एक्ट की कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
पुलिस रिपोर्ट पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
अदालत ने पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस को यह जानकारी होनी चाहिए थी कि जाहिद अली 2010 के मामले में 2017 में ही बरी हो चुके हैं। इसके बावजूद उस मामले को पुलिस रिपोर्ट में शामिल किया गया।
हाईकोर्ट ने पूरी कार्रवाई की रद्द
अदालत ने जाहिद अली को राहत देते हुए उनके खिलाफ गुंडा घोषित किए जाने का आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही गोंडा जिले से छह महीने के लिए किए गए externment का आदेश और कमिश्नर द्वारा उनकी अपील खारिज करने का आदेश भी निरस्त कर दिया।
इस तरह हाईकोर्ट ने जाहिद अली के खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत की गई पूरी कार्रवाई रद्द कर दी।


