गाजीपुर। भारत में रेलवे का इतिहास कई ऐसी दिलचस्प कहानियों से भरा पड़ा है, जिन्हें सुनकर आज भी यकीन करना मुश्किल लगता है। ऐसी ही एक कहानी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर स्थित ताड़ीघाट रेलवे स्टेशन से जुड़ी है। कभी यहां ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों को आगे की यात्रा पूरी करने के लिए गंगा नदी पार करनी पड़ती थी और इसके लिए नाव या स्टीमर का सहारा लिया जाता था।
1880 में शुरू हुआ था स्टेशन
ताड़ीघाट रेलवे स्टेशन का इतिहास ब्रिटिश दौर से जुड़ा है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक, दानापुर से ताड़ीघाट तक रेलवे शाखा 5 अक्टूबर 1880 को शुरू हुई थी। ताड़ीघाट गंगा के दक्षिणी किनारे पर स्थित था और इसके ठीक सामने गाजीपुर शहर था।
उस समय गंगा पर आज की तरह पुल नहीं था। इसलिए ट्रेन से ताड़ीघाट पहुंचने के बाद गंगा पार करने के लिए यात्रियों को नाव या स्टीमर का सहारा लेना पड़ता था। संसद के एक पुराने रिकॉर्ड में भी उल्लेख है कि गंगा पर पुल बनने से पहले लोग ट्रेन से ताड़ीघाट पहुंचते थे और वहां से नाव या स्टीमर के जरिए नदी पार करते थे।
ट्रेन के बाद नाव का सफर
कल्पना कीजिए कि आप ट्रेन में बैठे हैं और अचानक आपका रेल सफर खत्म हो जाता है। इसके बाद आपको सामान लेकर नदी के किनारे जाना है और फिर नाव में बैठकर गंगा पार करनी है। उस दौर में ताड़ीघाट से गाजीपुर पहुंचने के लिए यही व्यवस्था थी।
पुराने गजेटियर में भी ताड़ीघाट से गाजीपुर तक पहुंचने के लिए स्टीम फेरी की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। यानी उस समय रेलवे और जल परिवहन मिलकर यात्रियों की यात्रा पूरी करते थे।
व्यापार के लिए भी था अहम
ताड़ीघाट स्टेशन केवल यात्रियों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं था। गाजीपुर उस दौर में व्यापारिक गतिविधियों के लिए भी जाना जाता था। रेलवे के आने से सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना आसान हुआ, जबकि गंगा के रास्ते भी व्यापार जारी रहा। इतिहासकारों के अनुसार, उस समय गंगा क्षेत्र में नाव और स्टीमर व्यापार का महत्वपूर्ण साधन थे।
पुल बनने के बाद बदली तस्वीर
समय के साथ गंगा पर पुलों का निर्माण हुआ और लोगों के लिए नदी पार करना आसान होता गया। इसके बाद ट्रेन से उतरकर नाव पकड़ने की मजबूरी धीरे-धीरे खत्म हो गई।
ताड़ीघाट रेलवे स्टेशन करीब 143 साल तक रेलवे इतिहास का हिस्सा रहा। 2023 में पुराने ताड़ीघाट स्टेशन की रेल लाइन को नई व्यवस्था से जोड़ने के बाद इसका पुराना स्वरूप इतिहास बन गया।
आज भले ही ट्रेन और सड़क से गंगा पार करना आसान हो गया हो, लेकिन ताड़ीघाट की यह कहानी याद दिलाती है कि एक समय भारत में एक ही यात्रा को पूरा करने के लिए ट्रेन और नाव दोनों का सहारा लेना पड़ता था।

