वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभालने के आठ महीने बाद अपने करीबी सहयोगी सर्गियो गोर को भारत में नया अमेरिकी राजदूत नियुक्त किया है। व्हाइट हाउस से सीधा भेजे गए इस दूत की जिम्मेदारी भारत-अमेरिका रिश्तों में आए तनाव को संभालने की है। लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि तीन दशकों से बने भरोसे को आखिर किसने कुछ ही महीनों में तोड़ दिया। उंगलियां सीधे उठ रही हैं रिपब्लिकन पार्टी के ताकतवर सीनेटर लिंडसे ग्राहम की ओर।
8 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बातचीत पर पीएम मोदी ने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट किया। इसके जवाब में लिंडसे ग्राहम ने सार्वजनिक रूप से भारत की रूस नीति पर हमला बोला। भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने तुरंत ग्राहम से बात की और भारत का पक्ष रखने की कोशिश की, लेकिन ग्राहम ने अपना भारत-विरोधी एजेंडा जारी रखा। यह पहली बार नहीं है। पिछले कई महीनों से ग्राहम भारत को निशाना बना रहे हैं। उन्होंने अमेरिकी सीनेट में एक बिल पेश किया था जिसमें प्रस्ताव रखा गया कि रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर 500% तक शुल्क लगाया जाए। भले ही यह बिल पास नहीं हुआ, लेकिन उनकी असली सोच सामने आ गई। खुद ग्राहम ने कहा था कि जो देश रूसी तेल खरीदते हैं उन्हें तोड़ देना चाहिए। विडंबना यह है कि भारत ही नहीं, चीन और यूरोप भी रूस से ऊर्जा आयात करते हैं। यहां तक कि अमेरिका खुद रूस से यूरेनियम और पैलेडियम खरीदता है। इसके बावजूद ग्राहम का हमला लगातार सिर्फ भारत पर केंद्रित रहा।
भारत-अमेरिका व्यापार पर बड़ा असर
2024 में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार 129।2 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। लेकिन अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर 25% से 50% तक अतिरिक्त शुल्क लगाने से दोनों देशों के व्यापार में 7-10% तक गिरावट आ सकती है। ब्लूमबर्ग के अनुसार, भारत की GDP पर लगभग 1% का नकारात्मक असर पड़ेगा।
सबसे ज्यादा असर हीरे और आभूषण उद्योग पर होगा। भारत दुनिया का सबसे बड़ा हीरा काटने और पॉलिश करने का केंद्र है, जहां 90% से ज्यादा हीरे तैयार होते हैं। अब आशंका है कि यह कारोबार चीन या यूएई की ओर शिफ्ट हो सकता है। इसके अलावा जूते और कपड़ा उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित होंगे। यह वही पैटर्न है जैसा औपनिवेशिक दौर में ब्रिटेन ने भारत के कपड़ा उद्योग को नष्ट करने के लिए अपनाया था।
हथियार उद्योग से ग्राहम के गहरे रिश्ते
लिंडसे ग्राहम का राजनीतिक करियर और विचारधारा सीधे-सीधे अमेरिकी हथियार उद्योग से जुड़ा हुआ है। 2010 में उन्होंने ईरान पर सैन्य हमले की वकालत की थी। सेना में सेवा का दावा करने वाले ग्राहम कभी मोर्चे पर नहीं गए, बल्कि एक सैन्य वकील (JAG) की भूमिका में रहे।
इराक और अफगानिस्तान युद्ध के दौरान जब अमेरिकी जेलों में यातना और टॉर्चर की घटनाएं सामने आईं, तब उनकी निगरानी की जिम्मेदारी भी ग्राहम पर थी। जनवरी 2024 में एक अमेरिकी संस्था ने खुलासा किया था कि उनके सबसे बड़े राजनीतिक दानदाताओं में हथियार बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं। साफ है कि ग्राहम की राजनीति और उनका आक्रामक एजेंडा युद्ध और सैन्य उद्योग से संचालित है।
भारत के लिए विकल्प क्या हैं?
अमेरिका के साथ तनाव ने भारत को एक सख्त सबक दिया है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक हो सकती है। भारत को अब वैकल्पिक रास्तों पर तेजी से आगे बढ़ना होगा।
भारत को एशियाई गठबंधनों और क्षेत्रीय मंचों में अपनी उपस्थिति मजबूत करनी होगी।
रूस और चीन के साथ आर्थिक संबंधों को और गहराई देनी होगी।
यूरोप के साथ भी व्यापारिक साझेदारी बढ़ानी होगी, क्योंकि यूरोप भी अमेरिकी दबाव में आर्थिक संकट झेल रहा है और विकल्प तलाश रहा है।
लिंडसे ग्राहम की भूमिका ने भारत-अमेरिका रिश्तों को गहरी चोट पहुंचाई है। उनके बयान और प्रस्ताव भारत के खिलाफ एक तरह का आर्थिक युद्ध हैं। सवाल यह है कि क्या यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और हथियार उद्योग से मिली ताकत का नतीजा है या फिर अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा।
इतना तय है कि भारत किसी लिंडसे ग्राहम या अमेरिकी दबाव में नहीं आने वाला है । पिछले एक हफ़्ते में चीन के विदेश मंत्री के भारत दौरे के समय दोनों देशों के संयुक्त बयान और भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के रूस दौरे में हुए फैसले ने साफ कर दिया है कि अमेरिकी जमीन पर भारत विरोधी साजिश का मुकाबला करने के लिए दिल्ली ने कमर कस ली है ।
क्या भारत को आर्थिक रूप से तोड़ने की साजिश थी, अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की भूमिका पर सवाल
