नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लॉ छात्रों के अनुशासन और उनके खिलाफ कार्रवाई के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और राज्य बार काउंसिलों के पास लॉ स्टूडेंट्स के व्यवहार को रेगुलेट करने या उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार संबंधित विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान के पास होता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि बार काउंसिल छात्रों के एडवोकेट के रूप में एनरोल होने के बाद ही उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है। हालांकि, BCI को कानूनी शिक्षा के मानक तय करने और लागू करने का अधिकार है, लेकिन वह किसी लॉ छात्र के खिलाफ सीधे अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सकती।
कोर्ट की यह टिप्पणी NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से जुड़े विवाद के दौरान आई। विवाद की शुरुआत BCI के 13 अगस्त के उस आदेश से हुई थी, जिसमें NALSAR के 2026 बैच के ग्रेजुएट्स को राज्य बार काउंसिल में एनरोल न करने की बात कही गई थी। बताया गया कि छात्रों ने यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्य कांत के शामिल होने का विरोध किया था। विवाद बढ़ने के बाद BCI ने अपना आदेश वापस ले लिया था।
इसके बाद BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से माफी मांगी और कहा कि लोकतंत्र में असहमति का हमेशा स्वागत किया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि विवाद से जुड़ी उनकी किसी बात या पत्र से लॉ छात्रों की भावनाएं आहत हुई हैं, तो उन्हें इसका गहरा खेद है। मिश्रा ने यह भी कहा कि खेद जताना प्रतिष्ठा या अहंकार का विषय नहीं है, बल्कि यह स्वीकार करना है कि छात्रों की भावनाएं और उनकी चिंताएं महत्वपूर्ण हैं।

