वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों का आकार कम करने के फैसले ने अमेरिका के सहयोगी देशों के बीच चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से केवल दक्षिण कोरिया की सुरक्षा प्रभावित नहीं होगी, बल्कि जापान, ताइवान और यहां तक कि नाटो देशों में भी अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
ट्रंप ने अपने फैसले के पीछे दक्षिण कोरिया के ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान में शामिल न होने का हवाला दिया। साथ ही उन्होंने उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन के साथ अपने अच्छे संबंधों का भी उल्लेख किया। ट्रंप की विदेश नीति में व्यक्तिगत रिश्तों और तत्काल लाभ-हानि को महत्व देने की रणनीति पहले भी देखने को मिली है।
पूर्व अमेरिकी राजनयिक डैन फ्राइड ने ट्रंप के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि इससे दक्षिण कोरिया और जापान कमजोर होंगे, ताइवान की चिंता बढ़ेगी और चीन तथा उत्तर कोरिया को फायदा मिल सकता है। ओबामा प्रशासन में पूर्वी एशिया मामलों से जुड़े डैनी रसेल ने भी इसे अमेरिकी नीति की दिशा के विपरीत बताया। उनके मुताबिक, अमेरिका एक सहयोगी को दबाव में डाल रहा है और अपने विरोधी को प्रोत्साहन दे रहा है।
11 दिन चलने वाले सैन्य अभ्यास का आकार हुआ छोटा
ट्रंप ने रविवार को अमेरिकी सेना को दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले ‘उलची फ्रीडम शील्ड’ सैन्य अभ्यास का आकार कम करने का आदेश दिया। 11 दिन चलने वाला यह अभ्यास सोमवार को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शुरू हुआ, हालांकि इसके किन हिस्सों में कटौती की जाएगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया।
दक्षिण कोरिया में ट्रंप के इस फैसले को लेकर हैरानी जताई गई। दक्षिण कोरिया लंबे समय से अमेरिका का करीबी सैन्य सहयोगी है और उसे परमाणु हथियारों से लैस उत्तर कोरिया से लगातार सुरक्षा खतरा बना रहता है।
अमेरिकी कांग्रेस के कई डेमोक्रेट सांसदों ने भी ट्रंप के फैसले पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि किसी करीबी सहयोगी के साथ विरोधी जैसा व्यवहार करने से अमेरिका के गठबंधन कमजोर हो सकते हैं और चीन तथा उत्तर कोरिया को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है।
किम जोंग उन के साथ रिश्तों का भी दिया संकेत
ट्रंप ने सोमवार को अपने फैसले का बचाव करते हुए उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ फोन पर बातचीत की तस्वीर भी साझा की। इससे यह संकेत मिला कि वह प्योंगयांग के साथ अपने संबंधों को महत्व दे रहे हैं।
पूर्व अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट वुड के मुताबिक, दक्षिण कोरिया-अमेरिका के संयुक्त सैन्य अभ्यास उत्तर कोरिया को रोकने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनका कहना है कि अगर दक्षिण कोरिया को अपनी सुरक्षा को लेकर अमेरिकी प्रतिबद्धता कमजोर लगती है, तो वहां परमाणु हथियार विकसित करने की मांग और मजबूत हो सकती है।
अमेरिकी रक्षा और खुफिया क्षेत्र से जुड़े रहे मैथ्यू क्रोनिग ने भी कहा कि दक्षिण कोरिया में स्वतंत्र परमाणु क्षमता विकसित करने के समर्थन में बढ़ोतरी देखी गई है। ऐसे में सैन्य अभ्यासों में कटौती से अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर दक्षिण कोरिया का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
क्या ट्रंप को खुश करने की कोशिश कर रहा था दक्षिण कोरिया?
ट्रंप का यह फैसला ऐसे समय आया है जब दक्षिण कोरिया अमेरिका के साथ व्यापार और रक्षा संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था। पिछले साल दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्युंग की ट्रंप से मुलाकात के दौरान उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों और यहां तक कि व्हाइट हाउस की सजावट की भी तारीफ की थी।
ली ने ट्रंप के उत्तर कोरिया के साथ बेहतर संबंध बनाने के प्रयासों का समर्थन किया था और भविष्य में उत्तर कोरिया में ट्रंप टावर बनाए जाने की संभावना तक का संकेत दिया था।
इसके बावजूद सैन्य अभ्यासों में कटौती ने दक्षिण कोरिया के सामने अपनी दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
सहयोगियों को अब अपनी सुरक्षा पर ज्यादा सोचना होगा
विदेश मामलों की परिषद से जुड़े चार्ल्स कपचन के अनुसार, अमेरिकी सैन्य प्रतिबद्धताओं में कमी लंबे समय से उसके सहयोगी रहे देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर कर सकती है।
उनका कहना है कि अमेरिका के सहयोगी अब तक यह मानकर चलते रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उनकी सुरक्षा के लिए मौजूद रहेगा। लेकिन ट्रंप के हालिया फैसले के बाद उन्हें इस संभावना पर भी विचार करना पड़ सकता है कि भविष्य में अमेरिकी सुरक्षा छतरी पहले जैसी मजबूत न रहे।

