लेटेस्ट न्यूज़
21 Aug 2026, Fri

जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल अपने आप में SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं, अपमान की मंशा साबित करना जरूरी: इलाहाबाद हाई कोर्ट

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने SC/ST एक्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेने से अपने आप इस कानून के तहत अपराध नहीं बनता। यह भी साबित करना जरूरी है कि कथित जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे से किया गया था।

जस्टिस संतोष राय की पीठ ने वेगराज सिंह और एक अन्य की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए बरेली की अदालत की ओर से 21 मार्च 2025 को जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 358 के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया था।

सिर्फ ‘चमार’ शब्द कहना पर्याप्त नहीं

हाई कोर्ट ने 13 अगस्त को दिए अपने आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति के लिए केवल ‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल कर देना यह साबित नहीं करता कि आरोपी ने उसे उसकी अनुसूचित जाति से संबंधित होने के कारण अपमानित करने के उद्देश्य से ऐसा कहा था। अदालत के मुताबिक, SC/ST एक्ट के तहत अपराध निर्धारित करने के लिए कथित शब्दों और व्यवहार के पीछे आरोपी की स्पष्ट मंशा को भी देखा जाना जरूरी है।

यह मामला बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र का है। यहां दुष्कर्म और धमकी के आरोपों में एफआईआर दर्ज हुई थी। पुलिस जांच के बाद मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया, जबकि उसके पिता वेगराज सिंह और बड़े भाई दौलत सिंह को जांच के दौरान आरोपों से बाहर रखा गया था।

बाद में मुकदमे की सुनवाई के दौरान पीड़िता ने आरोप लगाया कि वेगराज सिंह और दौलत सिंह ने उसके लिए जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया था। इस बयान के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने दोनों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी कर दिया। इसके बाद दोनों ने हाई कोर्ट में अपील दाखिल की।

पुराने बयानों में नहीं था स्पष्ट आरोप

अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता के पहले के बयानों में उनके खिलाफ किसी विशेष भूमिका या कृत्य का उल्लेख नहीं था। CRPC की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज बयानों में भी उनके खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी से जुड़ा कोई स्पष्ट आरोप मौजूद नहीं था।

हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की मिलीभगत की ओर संकेत करने वाले पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में उन्हें BNSS की धारा 358 के तहत समन जारी करने में जल्दबाजी की। अदालत ने इसे कानूनी त्रुटि माना।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के हरदीप सिंह बनाम पंजाब सरकार मामले का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया था कि किसी व्यक्ति को चल रहे मुकदमे में आरोपी के रूप में शामिल करने की शक्ति असाधारण है और इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी से, केवल दुर्लभ मामलों में किया जाना चाहिए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को मुकदमे के बीच में आरोपी के तौर पर बुलाने के लिए केवल प्रथमदृष्टया सामग्री पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उससे कहीं अधिक मजबूत और ठोस साक्ष्य का होना जरूरी है।

By Aryavartkranti Bureau

आर्यावर्तक्रांति दैनिक हिंदी समाचार निष्पक्ष पत्रकारिता, सामाजिक सेवा, शिक्षा और कल्याण के माध्यम से सामाजिक बदलाव लाने की प्रेरणा और सकारात्मकता का प्रतीक हैं।