हम मरना नहीं चाहते, प्लीज बचा लोज् , समंदर में फंसी 20 हजार जिंदगियां, दाने-दाने को तरसे नाविक

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में पिछले एक महीने से भड़की जंग अब समंदर में भयानक कोहराम मचा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य और उसके आसपास के इलाके में करीब 3000 वाणिज्यिक जहाज फंस गए हैं, जिन पर 20 हजार से ज्यादा नाविक सवार हैं। इन नाविकों की जान हर पल सांसत में है और उनके सिर पर मौत की तलवार लटक रही है। जहाजों पर ताजा खाना और पीने का पानी या तो खत्म हो चुका है या बिल्कुल खत्म होने की कगार पर है। खौफ के साये में जी रहे ये नाविक लगातार हेल्पलाइन संस्थाओं से संपर्क कर मदद की गुहार लगा रहे हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि मदद के लिए आ रहे संदेशों की बाढ़ ने समुद्री हेल्पलाइन टीमों को भी बेबस कर दिया है।
बमबारी के बीच से आ रहे खौफनाक वीडियो
इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एसोसिएशन की सपोर्ट टीम को समंदर से दिल दहला देने वाले संदेश और वीडियो मिल रहे हैं। नाविक युद्ध क्षेत्र से अपने जहाजों के पास गिरते बमों के वीडियो भेजकर किसी भी तरह वहां से निकालने की मिन्नतें कर रहे हैं। अरब और ईरान के लिए ढ्ढञ्जस्न के नेटवर्क कोऑर्डिनेटर मोहम्मद अरराचेदी ने बताया कि नाविकों को समंदर में जैसे ही इंटरनेट मिलता है, वे रात के दो या तीन बजे भी फोन कर देते हैं। खौफजदा नाविकों की बस एक ही पुकार है कि वे बमबारी के बीच फंसे हैं और मरना नहीं चाहते। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री संस्था के मुताबिक, 28 फरवरी के बाद से इस अशांत इलाके में अब तक कम से कम आठ नाविकों या बंदरगाह मजदूरों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जिसने खौफ को कई गुना बढ़ा दिया है।
मौत के मुहाने पर खड़े हैं भारतीय नाविक
इस खौफनाक मंजर के बीच सबसे ज्यादा चौंकाने वाला सच इन नाविकों के शोषण का है। ढ्ढञ्जस्न को मिलने वाले आधे से ज्यादा ईमेल वेतन से जुड़ी चिंताओं के हैं। जान हथेली पर रखकर युद्ध क्षेत्र में काम कर रहे इन नाविकों को महज 16 डॉलर (करीब 1500 रुपए) रोज की मामूली दिहाड़ी मिल रही है। युद्ध क्षेत्र घोषित होने के बाद कई परेशान नाविक पूछ रहे हैं कि क्या अब उनकी दिहाड़ी बढ़ाकर 32 डॉलर की जाएगी? संस्था का कहना है कि यह कम वेतन जहाज मालिकों की मनमानी का नतीजा है, जो बिना उचित लेबर एग्रीमेंट के काम करा रहे हैं। भारत, फिलीपींस, बांग्लादेश, म्यांमार और इंडोनेशिया जैसे देशों के ये नाविक आर्थिक मजबूरी के चलते जहाज छोड़ने का खर्च नहीं उठा सकते, इसलिए वे मौत के साये में भी भूखे-प्यासे काम करने को मजबूर हैं।

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