नेपाल बाढ़ पर पर्यावरणविद् की चेतावनी: हिमालय के बढ़ते खतरे को समझें, टिकाऊ विकास जरूरी

कोलकाता, एजेंसी। नेपाल में अचानक आई बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यावरणीय खतरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी ने इसे केवल प्राकृतिक आपदा मानने के बजाय जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियों से जोड़कर देखने की जरूरत बताई है। उन्होंने टिकाऊ विकास के साथ-साथ आपदाओं से निपटने के लिए तत्काल तैयारी और बेहतर चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर जोर दिया।

कंधारी ने कहा कि हिमालय अपेक्षाकृत युवा पर्वत श्रृंखला है और यहां प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है। हालांकि, बढ़ते तापमान, प्रदूषण और इको-सेंसिटिव क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियां इन आपदाओं की गंभीरता बढ़ा रही हैं। उन्होंने कहा कि संवेदनशील इलाकों में ब्लास्टिंग और अनियोजित निर्माण जैसी गतिविधियों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

विकास के नाम पर पर्यावरण से समझौता न हो

पर्यावरणविद् ने कहा कि समस्या को व्यापक नजरिए से देखने की जरूरत है। कोयला उत्पादन, हाइड्रोपावर परियोजनाओं का निर्माण, अत्यधिक पर्यटन और बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पेड़ों की कटाई से जुड़े कई प्रोजेक्टों का भी उल्लेख किया और कहा कि ऐसी गलतियों से सबक लेने की जरूरत है।

हिमालयी देशों के बीच सहयोग जरूरी

कंधारी ने हिमालयी क्षेत्र की आपदाओं से निपटने के लिए भारत, नेपाल और चीन समेत सभी हिमालयी देशों के बीच सीमा पार सहयोग की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि सभी देशों को मिलकर आपदा से बचाव के उपाय विकसित करने चाहिए। साथ ही, अर्ली वार्निंग और सिग्नलिंग सिस्टम को मजबूत करना भी जरूरी है, ताकि समय रहते संवेदनशील क्षेत्रों के लोगों को सतर्क किया जा सके।

उन्होंने कहा कि हिमालय का बढ़ता तापमान और पर्यावरणीय बदलाव बेहद गंभीर विषय हैं। ऐसे नाजुक क्षेत्र में अब किसी भी तरह की लापरवाही की गुंजाइश नहीं है और विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है।

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