नई दिल्ली, एजेंसी। कभी 22 अरब डॉलर के वैल्यूएशन पर खड़ी रही भारत की दिग्गज एड-टेक कंपनी बायजूस आज गहरे वित्तीय और कानूनी संकट से जूझ रही है। बायजू अब कर्ज, मुकदमों, दिवालियापन की कार्यवाही और कथित तौर पर गायब 533 मिलियन डॉलर के विवाद के बीच बिखरता नजर आ रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह गिरावट भारत और अमेरिका दोनों महाद्वीपों में चल रही कानूनी लड़ाइयों, वित्तीय अनियमितताओं और आक्रामक विस्तार रणनीति के कारण तेज हुई।
शिखर से संकट तक की कहानी
2022 में कोविड-काल के दौरान ऑनलाइन शिक्षा की भारी मांग के चलते बायजू का वैल्यूएशन 22 अरब डॉलर (1.98 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच गया था और कंपनी ने वैश्विक विस्तार, बड़े अधिग्रहण और ब्रांडिंग पर भारी निवेश किया। हालांकि महामारी के बाद सस्ती फंडिंग कम हुई, लागत बढ़ी और निवेशकों का भरोसा डगमगाने लगा, जिससे कंपनी का वित्तीय ढांचा कमजोर पड़ता गया।
कैसे शुरू हुआ संकट?
बायजू की मुश्किलें 2023 में तब तेज हुईं जब ऑनलाइन शिक्षा की मांग में गिरावट आई और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई। इसी दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत कंपनी के दफ्तरों पर छापे मारे और लगभग ₹9,362 करोड़ के कथित उल्लंघन का नोटिस जारी किया। इसके साथ ही कंपनी के ऊपर कर्ज का दबाव भी बढ़ता गया। नवंबर 2021 में लिए गए 1.2 अरब डॉलर के टर्म लोन पर बायजूस कथित तौर पर तिमाही ब्याज भुगतान (करीब ₹330 करोड़) करने में चूक गया, जिसके बाद विदेशी लेंडर्स ने अमेरिका में मुकदमा दायर किया। जवाब में कंपनी ने भी लेंडर्स पर समय से पहले भुगतान की मांग तेज करने का आरोप लगाते हुए कानूनी कार्रवाई की।
बोर्ड से इस्तीफे और ऑडिटर का हटना
वित्तीय अनिश्चितता के बीच 2023 में कंपनी से कई हाई-प्रोफाइल एग्जिट हुए। बोर्ड के तीन निदेशकों जीवी रवि शंकर, रसेल ड्रेसेनस्टॉक और विवियन वू ने इस्तीफा दे दिया। इसके अलावा कंपनी के वित्तीय ऑडिटर डेलॉइट ने भी पद छोड़ दिया, जिससे पारदर्शिता को लेकर सवाल और गहरे हुए।
अमेरिकी कोर्ट का बड़ा झटका
नवंबर 2023 में एक अमेरिकी अदालत ने लेंडर्स के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि 1.2 अरब डॉलर का कर्ज लेने वाली विशेष इकाई (SPV) में लेंडर्स द्वारा निदेशक नियुक्त करना उचित था। अदालत ने सीईओ के भाई रिजु रवींद्रन को एसपीवी बोर्ड से हटाने के फैसले को भी सही ठहराया। रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2025 में अमेरिकी अदालत ने विवादित 533 मिलियन डॉलर से जुड़े मामले में लगभग 1.07 अरब डॉलर का डिफॉल्ट जजमेंट जारी किया, जिसने कंपनी के संकट को निर्णायक मोड़ दे दिया। इसके साथ ही क्रेडिटर्स ने कंपनी के सह-संस्थापकों पर फंड के दुरुपयोग और छिपाने के आरोप लगाते हुए कानूनी कार्रवाई तेज कर दी।
भारत में भी बढ़ी मुश्किलें
अमेरिका के साथ-साथ भारत में भी कंपनी पर दबाव बढ़ा। बीसीसीआई के बकाया भुगतान को लेकर मामला एनसीएलटी तक पहुंचा और 2024 में दिवालियापन से जुड़ी कार्यवाही शुरू हुई। इस दौरान बड़े पैमाने पर छंटनी हुई और कर्मचारियों की संख्या 2022 के लगभग 60,000 से घटकर 2024 तक करीब 14,000 रह गई।
आक्रामक विस्तार और लागत नियंत्रण की कमी का आरोप
पूर्व अधिकारियों के अनुसार, कंपनी ने अधिग्रहण और ब्रांडिंग पर अत्यधिक खर्च किया, जबकि लागत नियंत्रण और स्थायी राजस्व मॉडल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। कई फैसले अत्यधिक आशावाद के आधार पर लिए गए, जिससे नकदी संकट गहराता गया।
निवेशकों का भरोसा टूटा, वैल्यूएशन ढहा
लगातार गिरते वैल्यूएशन और कानूनी दबाव के बीच कंपनी अब करीब 200 मिलियन डॉलर की नई फंडिंग जुटाने की कोशिश कर रही है, जिसकी संभावित वैल्यूएशन मात्र 250 मिलियन डॉलर बताई जा रही है। लगातार घाटे, देरी से वित्तीय खुलासे और कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों ने निवेशकों का विश्वास कम किया। कुछ शुरुआती निवेशकों ने ऊंचे वैल्यूएशन पर अपनी हिस्सेदारी बेच दी, जबकि अन्य को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
दिवालियापन की कगार पर अरबों की कंपनी: कैसे बर्बाद हुई बायजू? क्या कर्ज, कुप्रबंधन और मुकदमों ने किया कंगाल?

