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24 Jan 2026, Sat

भारत का कर्तव्य है दुनिया को आचरण से मर्यादा का पाठ पढ़ाना: मोहन भागवत

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत आज डीडवाना के छोटी खाटू के दौरे पर रहे। इस दौरान जैन समाज की और से आचार्य महाश्रमण के सानिध्य मे आयोजित मर्यादा महोत्सव कार्यक्रम मे भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान संतो की वाणी सूनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि भारत का वास्तविक कार्य दुनिया को मर्यादा का पाठ पढ़ाना है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सीख केवल भाषणों या पुस्तकों के माध्यम से नहीं दी जा सकती, बल्कि इसके लिए हमें अपने आचरण को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करना होगा। भागवत डीडवाना के छोटी खाटू में आयोजित आचार्य महाश्रमण के 162वें मर्यादा महोत्सव को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पुस्तकों में ज्ञान सुरक्षित रहता है और भाषण भी सभी सुनते हैं, लेकिन बात तब तक पूरी नहीं होती जब तक उसे व्यवहार में न उतारा जाए।
परिस्थितियों के अनुरूप शाश्वत सत्य का पालन
संघ प्रमुख ने समय और परिस्थिति के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि जो बातें हजारों साल पहले बताई गई थीं, वे आज भी शाश्वत हैं। हालांकि, उन्हें अपनाने का तरीका समय के साथ बदलता रहता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि हजार साल पहले की परिस्थितियां भिन्न थीं और आज की परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए हमें अपने शाश्वत मूल्यों को वर्तमान परिवेश के मुताबिक ढालकर आचरण करना चाहिए। उन्होंने संगठन की ओर से किए जाने वाले लाठी के अभ्यास का जिक्र करते हुए कहा कि हम यह शक्ति साधना क्यों कर रहे हैं, इसका स्मरण रखने के लिए ही वे संतों के सानिध्य में आते हैं।
एकात्मता और सत्य की खोज
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने वैश्विक दृष्टिकोण और भारतीय दर्शन की तुलना की। उन्होंने कहा कि सत्य की खोज में पूरी दुनिया निकली थी, लेकिन कुछ समय बाद बाकी लोग रुक गए, जिसके कारण वे शाश्वत सत्य तक नहीं पहुंच पाए। हमारे पूर्वजों ने उस सत्य को खोजा और महसूस किया कि बाहरी रूप से भिन्न दिखने के बावजूद हम सब मूल रूप से एक ही हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब हम इस विचार को आत्मसात कर लेते हैं कि मूल में सब एक हैं, तो संसार में कोई भी पराया नहीं रह जाता और संपूर्ण मानवता अपना परिवार लगने लगती है।
संकट के समय में भारत दुनिया की हमेशा मदद की, हम तो पाकिस्तान में जब बाढ़ आई तो उसकी भी मदद करने पहुंच गया, मालदीव की सहायता की, नेपाल की सहयता की और श्रीलंका की भी सहयता की क्योंकि यह धर्म है।
इस धर्म को सम्पूर्ण दुनिया को देने का काम समय समय पर भरता वर्ष ने किया है और करता रहेगा यह भारत का ईश्वर प्रदत्त और नियति प्रदत्त कर्तव्य है। लेकिन वो करने की भी एक पद्धति है। अपने सामरिक आर्थिक या बलपूर्वक नहीं करना है। भागवत बोले – भारत का लक्ष्य दुनिया को जीतना नहीं, बल्कि अपने आचरण से दिशा दिखाना, दुनिया को संस्कारित करना भारत का ईश्वर-प्रदत्त कर्तव्य, अब तैयार होने का समय आ गया, पाकिस्तान में बाढ़ आई तो हमने मदद की, क्योंकि यही हमारा धर्म है।

By Aryavartkranti Bureau

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