भारत में जून बना 125 वर्षों का पांचवां सबसे शुष्क महीना और इसने किसानों, कृषि विशेषज्ञों तथा नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार जून 2026 में देशभर में सामान्य से लगभग 39.8% कम वर्षा दर्ज की गई। यह वर्ष 1901 से उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर जून का पांचवां सबसे शुष्क महीना माना गया है। कमजोर मानसून और बारिश में देरी का असर खरीफ फसलों की बुवाई, जलाशयों के जलस्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई के शुरुआती दिनों में अच्छी बारिश नहीं होती, तो धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और जरूरत पड़ने पर किसानों के लिए वैकल्पिक योजनाएं लागू की जाएंगी। अधिक राष्ट्रीय समाचार के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहें।
जून में बारिश इतनी कम क्यों हुई?
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस वर्ष मानसून केरल में सामान्य से कुछ दिन देर से पहुंचा और इसके बाद पश्चिमी एवं मध्य भारत की ओर इसकी प्रगति लगभग दो सप्ताह तक धीमी रही। इसी कारण देश के अधिकांश हिस्सों में जून के दौरान अपेक्षित वर्षा नहीं हो सकी।
विशेषज्ञों के अनुसार मानसून की गति धीमी होने के पीछे कई मौसम संबंधी कारण रहे, जिनमें प्रशांत महासागर की जलवायु परिस्थितियां और मानसूनी हवाओं की कमजोरी भी शामिल हैं।
किसानों की बढ़ी चिंता
भारत की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में जून में कम बारिश होने से किसानों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
विशेष रूप से इन फसलों पर असर पड़ सकता है—
- धान
- मक्का
- सोयाबीन
- कपास
- दालें
यदि जुलाई में पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तो बुवाई का क्षेत्र और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
खरीफ फसलों की बुवाई में गिरावट
कृषि मंत्रालय के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार 25 जून तक खरीफ फसलों की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 23% कम रही। धान, सोयाबीन, कपास और मक्का की बुवाई में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई में अच्छी बारिश होने पर इस कमी की कुछ भरपाई संभव है।
जल संकट की आशंका
कम वर्षा का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो जलाशयों, नदियों और भूजल स्तर पर भी प्रभाव पड़ सकता है। इसका असर पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी देखने को मिल सकता है।
हालांकि कई बड़े जलाशयों में पिछले वर्ष की तुलना में पर्याप्त पानी उपलब्ध होने से तत्काल स्थिति कुछ हद तक नियंत्रित मानी जा रही है।
सरकार ने शुरू की तैयारी
कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार पहले ही 300 से अधिक संवेदनशील जिलों के लिए वैकल्पिक कृषि योजनाएं तैयार कर चुकी है। राज्यों को कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने, जल संरक्षण और सिंचाई सुविधाओं को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं।
खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है असर
यदि बारिश की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो कृषि उत्पादन घट सकता है। ऐसी स्थिति में सब्जियों, दालों और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी क्योंकि जुलाई और अगस्त की बारिश पूरे मानसून सीजन की तस्वीर बदल सकती है।
क्या जुलाई में सुधर सकती है स्थिति?
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जुलाई के दौरान मानसून के सक्रिय होने की संभावना है। यदि अगले कुछ सप्ताह में सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा होती है तो खेती और जल संसाधनों की स्थिति में सुधार आ सकता है।
इसी कारण कृषि विशेषज्ञ किसानों को घबराने के बजाय स्थानीय कृषि विभाग और मौसम विभाग की सलाह के अनुसार बुवाई करने की सलाह दे रहे हैं।
किसानों के लिए सुझाव
विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे:
- स्थानीय मौसम पूर्वानुमान पर नियमित नजर रखें।
- कम अवधि वाली फसलों पर विचार करें।
- उपलब्ध सिंचाई संसाधनों का बेहतर उपयोग करें।
- जल संरक्षण के उपाय अपनाएं।
- कृषि विभाग की सलाह के अनुसार बुवाई की योजना बनाएं।
निष्कर्ष
भारत में जून बना 125 वर्षों का पांचवां सबसे शुष्क महीना देश के लिए एक महत्वपूर्ण मौसम संबंधी संकेत है। कमजोर मानसून का असर कृषि, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, लेकिन आने वाले हफ्तों की बारिश स्थिति को काफी हद तक बदल भी सकती है। फिलहाल किसानों, नीति-निर्माताओं और मौसम वैज्ञानिकों की नजर जुलाई के मानसून पर टिकी हुई है।

