वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका ने ड्रोन और उनके कलपुर्जों के आयात पर भारी टैरिफ लगाने का फैसला किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का कहना है कि देश ड्रोन और उनके पार्ट्स के लिए विदेशी निर्माताओं पर काफी हद तक निर्भर है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है।
व्हाइट हाउस के अनुसार, ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित आदेश के तहत कुछ खास आकार और क्षमताओं वाले राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील ड्रोन पर 100 फीसदी एड वैलोरम टैरिफ लगाया जाएगा। वहीं, छोटे आकार के ड्रोन पर 25 फीसदी टैरिफ लागू होगा।
सहयोगी देशों के लिए अलग टैरिफ
अमेरिका ने अपने कुछ प्रमुख सहयोगी देशों से आयात होने वाले ड्रोन और उनके पार्ट्स के लिए अलग-अलग दरें तय की हैं। यूरोपीय संघ, जापान, लिकटेंस्टीन, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान से आने वाले ड्रोन व उनके कलपुर्जों पर 15 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा। वहीं, ब्रिटेन से आयात होने वाले ड्रोन पर 10 फीसदी एड वैलोरम टैरिफ लागू होगा।
व्हाइट हाउस के मुताबिक, नए टैरिफ का एक हिस्सा 21 दिनों के भीतर लागू हो जाएगा। कम संवेदनशील श्रेणी में आने वाले ड्रोन और उनके पार्ट्स पर टैरिफ 180 दिन बाद प्रभावी होगा। इसके अलावा, जिन उत्पादों को आदेश पर हस्ताक्षर के 20 दिनों के भीतर पेंटागन की सिफारिश पर फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) की कवर्ड लिस्ट से छूट मिल जाती है, उन पर भी 180 दिन बाद टैरिफ लागू किया जाएगा।
ट्रंप ने क्यों लिया यह फैसला?
ट्रंप के आदेश के मुताबिक, कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लटनिक ने अमेरिका में बिना पायलट वाले एयरक्राफ्ट सिस्टम (UAS) के आयात के प्रभाव की जांच की थी। जांच में सामने आया कि अमेरिकी बाजार में विदेशी निर्माताओं से आने वाले UAS की हिस्सेदारी काफी अधिक है। इसके चलते अमेरिका ड्रोन और उनके पार्ट्स के लिए विदेशी स्रोतों पर अत्यधिक निर्भर हो गया है।
जांच में यह भी पाया गया कि कुछ विदेशी कंपनियों द्वारा बनाए गए ड्रोन और उनके कलपुर्जे अमेरिकी सुरक्षा और रक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं। साथ ही, घरेलू ड्रोन उद्योग फिलहाल देश की सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त उत्पादन नहीं कर रहा है।
‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से जुड़ा फैसला?
ड्रोन पर टैरिफ लगाने के फैसले को ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति का हिस्सा माना जा रहा है। कानूनी चुनौतियों और विश्लेषकों की आलोचनाओं के बावजूद ट्रंप प्रशासन टैरिफ को अपनी व्यापार और विदेश नीति के महत्वपूर्ण हथियार के रूप में इस्तेमाल करता रहा है।
इस फैसले का असर अमेरिका में ड्रोन की कीमतों, विदेशी कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी और घरेलू ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग पर पड़ सकता है। सरकार का उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तकनीकों में विदेशी निर्भरता कम करना है।
चीन पर सबसे ज्यादा असर की आशंका
हालांकि ट्रंप प्रशासन ने आदेश में सीधे चीन का नाम लेकर टैरिफ नहीं लगाया है, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर चीनी ड्रोन उद्योग पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। वैश्विक ड्रोन बाजार में चीनी कंपनियों, खासकर DJI, की मजबूत पकड़ है।
उद्योग संगठन AUVSI के अनुसार, चीनी कंपनियों का कंज्यूमर ड्रोन बाजार में करीब 90 फीसदी और एंटरप्राइज ड्रोन बाजार में 70 फीसदी से अधिक हिस्सा है। अमेरिका पहले से ही चीनी ड्रोन तकनीक पर कई तरह की पाबंदियां बढ़ा रहा है। ऐसे में नए टैरिफ से चीनी कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में कारोबार करना और महंगा हो सकता है।
भारत के लिए बढ़ सकता है अवसर
अमेरिका में अगर खरीदार चीन से ड्रोन और उनके पार्ट्स खरीदने से दूरी बनाते हैं, तो भारत समेत अन्य देशों के निर्माताओं के लिए अमेरिकी बाजार में अपनी जगह बनाने का अवसर बढ़ सकता है।
विशेष रूप से सर्विलांस, कृषि, मैपिंग और औद्योगिक ड्रोन के क्षेत्र में भारतीय कंपनियों को फायदा मिल सकता है। भारत पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और घरेलू ड्रोन इकोसिस्टम को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में अमेरिकी बाजार में चीन की संभावित घटती हिस्सेदारी भारतीय ड्रोन निर्माताओं के लिए एक नया अवसर बन सकती है।

