नई दिल्ली। दुनिया में जनसंख्या का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक, 2026 तक दुनिया के 64 देश और क्षेत्र अपनी आबादी के उच्चतम स्तर यानी जनसंख्या पीक को पार कर चुके हैं। अब इन देशों में आबादी धीरे-धीरे घट रही है। इनमें बड़ी संख्या यूरोप और पूर्वी एशिया के देशों की है, जहां लंबे समय से जन्मदर कम बनी हुई है। पूर्वी यूरोप के कई देशों में बड़े पैमाने पर माइग्रेशन ने भी आबादी घटने की रफ्तार बढ़ाई है।
भारत की स्थिति फिलहाल अलग है। दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत में जनसंख्या अभी बढ़ रही है। हालांकि, यह बढ़ोतरी हमेशा जारी नहीं रहने वाली। ‘अवर वर्ल्ड इन डेटा’ के संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों पर आधारित विश्लेषण के अनुसार, भारत 2060 के दशक में अपनी जनसंख्या के उच्चतम स्तर पर पहुंच सकता है। इसके बाद आबादी में गिरावट शुरू होने की संभावना है।
जापान से चीन तक कई देश पीक पार कर चुके
जनसंख्या में गिरावट का असर कई देशों में पहले ही दिखाई देने लगा है। जापान और इटली अपनी आबादी के पीक को एक दशक से ज्यादा समय पहले पार कर चुके हैं। वहीं स्पेन, दक्षिण कोरिया और चीन में भी 2010 और 2020 के दशक के दौरान जनसंख्या अपने उच्चतम स्तर पर पहुंची और अब गिरावट शुरू हो चुकी है।
थाईलैंड में भी जन्मदर लंबे समय से कम है। 1990 के दशक की शुरुआत में ही वहां फर्टिलिटी रेट दो बच्चों प्रति महिला से नीचे आ गई थी और अब यह 1.2 से भी कम है। दक्षिण अमेरिका के उरुग्वे में भी औसत फर्टिलिटी रेट करीब 1.4 बच्चे प्रति महिला रह गई है।
संयुक्त राष्ट्र के 2100 तक के अनुमानों को देखें तो कुछ देशों में गिरावट काफी बड़ी हो सकती है। दक्षिण कोरिया और चीन की आबादी इस सदी के अंत तक मौजूदा स्तर के आधे से भी कम रह सकती है। इटली की आबादी में 40 फीसदी से अधिक और स्पेन व थाईलैंड की आबादी में करीब एक-तिहाई तक की कमी का अनुमान है।
भारत समेत कई देशों की बारी आने वाली
आने वाले दशकों में जनसंख्या पीक पार करने वाले देशों की संख्या और बढ़ सकती है। अनुमान है कि 2050 के दशक तक दक्षिण अमेरिका के ज्यादातर देश अपनी अधिकतम आबादी पार कर चुके होंगे। इसके बाद 2060 के दशक में दक्षिण एशिया के कई देशों में भी आबादी का ग्राफ नीचे जाने की शुरुआत हो सकती है।
भारत भी इसी दौर में अपने जनसंख्या पीक तक पहुंच सकता है। यानी फिलहाल देश की आबादी बढ़ रही है, लेकिन अगले तीन-चार दशकों में इसका ग्राफ स्थिर होकर नीचे की ओर मुड़ सकता है।
भविष्य तीन अहम फैक्टर्स पर निर्भर
जनसंख्या के ये अनुमान मुख्य रूप से तीन चीजों पर आधारित हैं—फर्टिलिटी रेट, लाइफ एक्सपेक्टेंसी और माइग्रेशन। इनमें से किसी एक में बड़ा बदलाव भविष्य की तस्वीर बदल सकता है। खास तौर पर माइग्रेशन का असर काफी महत्वपूर्ण है। कई हाई-इनकम देशों में जन्मदर कम होने के बावजूद इमिग्रेशन की वजह से आबादी स्थिर या बढ़ती हुई दिखाई देती है। अमेरिका इसका प्रमुख उदाहरण है। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा अनुमानों में वहां सदी के अंत तक भी आबादी का पीक आने की संभावना नहीं है, क्योंकि इसमें लगातार इमिग्रेशन जारी रहने का अनुमान शामिल है।
अगर अमेरिका में माइग्रेशन को शून्य मान लिया जाए, तो वहां भी आबादी जल्द पीक पर पहुंच सकती है और 2100 तक करीब 6 करोड़ की कमी हो सकती है। माइग्रेशन वाले और बिना माइग्रेशन वाले अनुमानों में अमेरिका की आबादी का अंतर करीब 13 करोड़ तक पहुंच सकता है।
दक्षिण कोरिया भविष्य की बड़ी चुनौती
दक्षिण कोरिया घटती आबादी की चुनौती का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। वहां जन्मदर इतनी कम है कि केवल फर्टिलिटी बढ़ने, लाइफ एक्सपेक्टेंसी में सुधार या इमिग्रेशन बढ़ने से आबादी में गिरावट को रोकना बेहद मुश्किल माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, दुनिया की जनसंख्या का सवाल अब सिर्फ ‘आबादी कितनी बढ़ेगी’ तक सीमित नहीं रह गया है। कई देशों के सामने अब घटती और बूढ़ी होती आबादी बड़ी चुनौती बन रही है।
भारत के लिए फिलहाल तस्वीर राहत देने वाली है, क्योंकि यहां जनसंख्या अभी बढ़ रही है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा अनुमानों के मुताबिक, 2060 के दशक में भारत भी जनसंख्या के पीक पर पहुंच सकता है। इसके बाद देश को भी घटती आबादी के दौर का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, फर्टिलिटी, जीवन प्रत्याशा और माइग्रेशन में बदलाव इस समयसीमा को आगे-पीछे कर सकते हैं।

