नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान न्यायालय ने कानून, स्वास्थ्य और आयुष मंत्रालयों से जवाब मांगा है। न्यायालय ने यह कदम एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर उठाया है। याचिका में मांग की गई है कि एलोपैथिक डॉक्टरों की तरह आयुष (AYUSH) डॉक्टरों को भी कानून के तहत ‘पंजीकृत चिकित्सक’ का दर्जा दिया जाए।
कानून में बदलाव की मांग
याचिका में 1954 के ‘ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट’ की समीक्षा करने की बात कही गई है। मांग है कि आज के वैज्ञानिक विकास के हिसाब से इस कानून को अपडेट करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि आयुष डॉक्टरों को इस एक्ट की धारा दो (सीसी) के तहत ‘पंजीकृत चिकित्सक’ शामिल किया जाना चाहिए।
कोर्ट में दिलचस्प बातचीत
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। याचिका कानून के छात्र नितिन उपाध्याय ने दायर की है, जिनका पक्ष उनके पिता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने रखा। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने पूछा, “क्या वह आपका बेटा है?” वकील ने कहा, “हां।” इस पर बेंच ने टिप्पणी की, “हमें लगा था उसे गोल्ड मेडल वगैरह मिलेगा, लेकिन वह तो पीआईएल दाखिल कर रहा है। अब तुम पढ़ाई क्यों नहीं करते?” कोर्ट ने आगे कहा कि वे नोटिस जारी कर रहे हैं, सिर्फ उनके बेटे के लिए, ताकि वह अच्छे से पढ़ाई करे।
विज्ञापन पर रोक से जुड़ी समस्या
इस एक्ट का मकसद कुछ मामलों में दवाओं के विज्ञापन को नियंत्रित करना है, ताकि जादुई गुणों का दावा करने वाले उपायों के कुछ खास उद्देश्यों के लिए विज्ञापन पर रोक लगाई जा सके। एक्ट की धारा दो (सीसी) ‘पंजीकृत चिकित्सक’ की परिभाषा से संबंधित है। याचिका में कहा गया है, “यह एक्ट जनता को झूठे और गुमराह करने वाले मेडिकल विज्ञापनों से बचाने के लिए बनाया गया था। हालांकि, धारा तीन (डी) कुछ बीमारियों और स्थितियों से संबंधित विज्ञापनों पर पूरी तरह से रोक लगाती है।” वहीं एक्ट की धारा तीन कुछ बीमारियों और विकारों के इलाज के लिए कुछ दवाओं के विज्ञापन पर रोक से संबंधित है।
दलील में क्या?
याचिका में कहा गया है कि आयुष डॉक्टर कानून की धारा 14 की छूट के दायरे में नहीं आते। इस वजह से वे गंभीर बीमारियों की दवाओं का विज्ञापन नहीं कर पाते और जनता को इनके बारे में जानकारी नहीं मिल पाती। कानून की धारा तीन(डी) सच्चे और झूठे विज्ञापनों में फर्क किए बिना सब पर रोक लगाती है। दलील है कि इस पुराने कानून ने बीमारियों के इलाज की जानकारी पाने के अधिकार को खत्म कर दिया है। कानून का मकसद हानिकारक विज्ञापनों को रोकना था, लेकिन अब यह आयुष डॉक्टरों के सही विज्ञापनों को भी रोक रहा है। याचिका में कहा गया है कि वैज्ञानिक रूप से सही विज्ञापन मरीजों तक जानकारी पहुंचाने का सही जरिया हैं। इसलिए, मांग की गई है कि केंद्र सरकार एक विशेषज्ञ समिति बनाए। यह समिति आज के विज्ञान के हिसाब से कानून की समीक्षा करे और उसे अपडेट करे।

