नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश में लापता लोगों की तलाश और मानव तस्करी पर रोक लगाने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलते ही उसकी उम्र या लिंग देखे बिना तुरंत एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि उसके 22 मई के आदेश को लेकर कुछ राज्यों में यह गलतफहमी होना गंभीर चिंता का विषय है कि निर्देश केवल लापता बच्चों पर लागू होता है। अदालत ने साफ किया कि आदेश में इस्तेमाल किया गया ‘व्यक्ति’ शब्द हर उम्र और हर लिंग के व्यक्ति को शामिल करता है।
‘जानबूझकर गलत व्याख्या की गई’
5 अगस्त के आदेश में पीठ ने कहा कि उसे यह जानकर हैरानी हुई कि कुछ राज्यों ने ‘व्यक्ति’ शब्द का अर्थ केवल बच्चे तक सीमित कर दिया। अदालत ने इसे जानबूझकर और गलत नीयत से की गई व्याख्या बताया।
पीठ ने कहा कि उसके पिछले आदेश की भाषा पूरी तरह स्पष्ट थी और उसमें किसी तरह की अस्पष्टता नहीं थी। अदालत ने दोहराया कि लापता व्यक्ति चाहे बच्चा हो या वयस्क और चाहे किसी भी लिंग का हो, उसके मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए।
आदेश का पालन नहीं हुआ तो मुख्य सचिव और DGP पर कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने 22 मई के निर्देशों का पूरी तरह और उनकी मूल भावना के अनुरूप पालन नहीं किया है तो संबंधित मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।
ऐसे अधिकारियों को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़ सकता है और उन्हें हलफनामा दाखिल कर यह बताना होगा कि अदालत के आदेश का पालन नहीं करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।
22 मई के आदेश में क्या कहा गया था?
सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई के अपने आदेश में देश के सभी पुलिस थानों को निर्देश दिया था कि किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलते ही बिना किसी शुरुआती जांच या 24 घंटे की प्रतीक्षा के एफआईआर दर्ज की जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि परिवार से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह पहले खुद लापता व्यक्ति की तलाश करे और उसके बाद पुलिस से संपर्क करे। एफआईआर में व्यक्ति या बच्चे के अपहरण अथवा मानव तस्करी से संबंधित भारतीय न्याय संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
शुरुआती घंटे ‘गोल्डन आवर्स’
सुप्रीम कोर्ट ने लापता लोगों के मामलों में शुरुआती घंटों को बेहद महत्वपूर्ण बताया। अदालत के मुताबिक, व्यक्ति के लापता होने के बाद शुरुआती समय में उसकी सुरक्षित बरामदगी की संभावना अधिक रहती है। इसलिए पुलिस को तलाश शुरू करने के लिए 24 घंटे इंतजार नहीं करना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि लापता व्यक्ति 24 घंटे के भीतर मिल भी जाता है और परिवार से मिल जाता है, तब भी पुलिस को मामले में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।
मानव तस्करी के संदेह पर विशेष यूनिट को सौंपा जाए मामला
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि पुलिस के पास किसी लापता व्यक्ति के मामले में मानव तस्करी शामिल होने का ठोस कारण है, तो मामले को चार महीने की अवधि पूरी होने का इंतजार किए बिना संबंधित विशेष यूनिट को सौंप दिया जाए।
इसके साथ ही केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी मानव तस्करी रोधी इकाइयों (Anti-Human Trafficking Units) को निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी तरह सक्रिय करने का निर्देश दिया गया है।
अदालत का उद्देश्य लापता लोगों की शिकायतों, मानव तस्करी की जांच और पीड़ितों की बरामदगी व पुनर्वास के लिए देशभर में एक प्रभावी और समन्वित व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

