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4 Aug 2026, Tue

यौन अपराध मामलों में संवेदनशील भाषा अपनाएं, ‘बेबस महिला’ और ‘पवित्रता’ जैसे शब्दों से बचें: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों के न्यायाधीशों के लिए नई गाइडलाइंस जारी करते हुए कहा है कि रेप और यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों के फैसले लिखते समय जेंडर आधारित रूढ़िवादी सोच और पीड़ित को दोषी ठहराने वाली भाषा से बचना चाहिए। अदालतों को ऐसे मामलों में अधिक संवेदनशील, निष्पक्ष और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।

ये दिशानिर्देश सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट ‘Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments’ का हिस्सा हैं। यह रिपोर्ट देशभर की ट्रायल कोर्ट के 125 फैसलों के अध्ययन के बाद तैयार की गई है।

रिपोर्ट में न्यायाधीशों के नियमित प्रशिक्षण और लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। समिति ने कहा कि फैसलों में “प्रोसिक्यूट्रिक्स” (शिकायतकर्ता महिला), “बेबस महिला”, “पवित्रता खो दी”, “मर्यादा भंग हुई” जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचना चाहिए। समिति के अनुसार, इस तरह की भाषा पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाती है और पीड़ितों को दोबारा मानसिक आघात पहुंचा सकती है।

इसके बजाय अदालतों को “पीड़ित (Victim)”, “सर्वाइवर (Survivor)”, “शिकायतकर्ता (Complainant)”, “यौन उत्पीड़न (Sexual Assault)” और “शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy)” जैसे तटस्थ और कानूनी रूप से उपयुक्त शब्दों का प्रयोग करने की सलाह दी गई है।

समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान जजों को रूढ़िवादी धारणाओं के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए। केवल इसलिए कि शिकायत दर्ज कराने में देरी हुई, पीड़ित ने शारीरिक प्रतिरोध नहीं किया या शरीर पर चोट के निशान नहीं मिले, इसका अर्थ सहमति नहीं माना जा सकता। रिपोर्ट में कहा गया है कि आघात की स्थिति में हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है।

रिपोर्ट में न्यायाधीशों को यह भी सलाह दी गई है कि बिना सहमति वाले मामलों या नाबालिगों से जुड़े मामलों में “शारीरिक संबंध” जैसे शब्दों के बजाय “रेप”, “यौन हमला” या “यौन हिंसा” जैसे कानूनी रूप से सटीक शब्दों का इस्तेमाल किया जाए।

विशेषज्ञ समिति ने यह भी कहा कि किसी महिला के पहनावे के आधार पर उसके चरित्र, शालीनता या आचरण को लेकर कोई टिप्पणी या निष्कर्ष निकालना पूरी तरह अस्वीकार्य है। साथ ही अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ितों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए।

गौरतलब है कि यह विशेषज्ञ समिति 10 फरवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद गठित की गई थी। उस फैसले में यौन अपराधों और कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों के लिए संवेदनशीलता और सहानुभूति बढ़ाने संबंधी व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने की आवश्यकता जताई गई थी।

By Aryavartkranti Bureau

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