बंगलूरू। भारतीय न्यायपालिका में तकनीक का प्रवेश एक बड़े बदलाव का संकेत है, लेकिन यह बदलाव मानवीय संवेदनाओं और संवैधानिक नैतिकता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। शनिवार को बंगलूरू में आयोजित न्यायिक अधिकारियों के 22वें द्विवार्षिक राज्य-स्तरीय सम्मेलन में देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और न्याय प्रणाली के अंतर्संबंधों पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी।
‘एआई के युग में न्यायपालिका की पुनर्कल्पना’ विषय पर बोलते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को एआई से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा, ‘जब आपके सामने जटिल कानूनी सवाल आते हैं, तो आप अधिक धैर्य और गहराई से विचार करते हैं। एआई के साथ भी हमें यही रुख अपनाना होगा। इसे सावधानी और सचेत होकर इस्तेमाल करें, जिससे आपके भीतर बैठा ‘जज’ किसी तकनीकी उपकरण से प्रभावित न हो।’
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एआई केवल एक सहायक हो सकता है, विकल्प नहीं। न्याय की प्रक्रिया केवल डाटा का विश्लेषण नहीं है, बल्कि यह एक चिंतनशील और नैतिक कार्य है जो संवैधानिक मूल्यों से निर्देशित होता है।
एआई की ‘भ्रम’ वाली दुनिया से खतरा
मुख्य न्यायाधीश ने एआई के बढ़ते खतरों, विशेषकर हैलुसिनेशन यानी भ्रम पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि एआई का दुरुपयोग भ्रामक याचिकाओं और सतही तौर पर आकर्षक लेकिन कानूनी रूप से खोखले दावों को पेश करने के लिए किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश का कहना है कि इससे पहले से ही बोझ तले दबी न्याय व्यवस्था पर दबाव और बढ़ेगा।

